
Radha Ashtami Ka Vrat Kaise Karen: भगवान कृष्ण की प्रियतमा राधा रानी का अवतरण दिवस राधा अष्टमी का पर्व भादो मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है। माना जाता है कि इस दिन व्रत और पूजा करने से 1000 एकादशी व्रत में 1000 पवित्र नदियों में स्नान करने के समान पुण्यफल मिलता है।
राधा अष्टमी व्रत भक्ति प्रेम और समर्पण का प्रतीक है जो भक्तों को राधा कृष्ण का आशीर्वाद दिलाता है जिससे जीवन में सुख समृद्धि के प्राप्ति होती है आज हम जानेंगे कि राधा अष्टमी व्रत कैसे किया जाता है और इसकी पूजा विधि भोग और नियमों के बारे में जानेंगे।
राधा अष्टमी का महत्व (Radha Ashtami 2025)
राधा अष्टमी भादो महीने की शुक्ला पक्ष की अष्टमी को मनाए जाति है जो सामान्य रूप से कृष्ण जन्मअष्टमी के कुछ दिन बाद आती है जन्माष्टमी भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव है जबकी राधा अष्टमी राधा रानी के जन्म उत्सव का पवित्र दिन है। राधा रानी को भगवान कृष्ण की प्रेयसी और प्रेम का प्रतीक माना जाता है। उनके बिना श्री कृष्ण की पूजा पूरी नहीं होती है।
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शास्त्रों के अनुसार राधा अष्टमी का व्रत करने से भक्तों को राधा कृष्ण की कृपा प्राप्त होती है और यह व्रत आध्यात्मिक और भौतिक सुख प्रदान करता है। यहां व्रत इतना पुण्य कारक है कि इस 1000 एकादशी व्रत या पवित्र नदियों में स्नान के बराबर माना जाता है।
राधा अष्टमी कब है(Radha Ashtami Kab Hai)
2025 में राधा अष्टमी 31 अगस्त रविवार को मनाई जाएगी इस दिन भक्त राधा कृष्ण की भक्ति में लीन होकर व्रत और पूजा करते हैं। राधा अष्टमी का व्रत न केवल राधा रानी के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का दिन है बल्कि यह भक्तों को आत्मिक शांति और भगवान के प्रति समर्पण का अनुभव भी कराता है।
पूजा का समय
राधा अष्टमी की पूजा के लिए दो समय निश्चित है पुराने के अनुसार राधा रानी का जन्म दोपहर 12:00 हुआ था इसलिए इस समय पूजा करना बहुत शुभ माना जाता है। वहीं ब्रज परंपरा के भक्त सुबह 4:00 बजे पूजा करना पसंद करते हैं क्योंकि यह एक शांत और ठंडा समय होता है। हालांकि भक्त अपनी सुविधा और परंपरा के अनुसार इनमें से किसी भी समय पूजा कर सकते हैं।
राधा अष्टमी का व्रत कैसे करें?(Radha Ashtami Ka Vrat Kaise Karen)
राधा अष्टमी की पूजा करने से पहले कुछ विशेष तैयारी करना जरूरी है जो इस तरह से हैं-
चौकी की सजावट– चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। लाल रंग राधा रानी को बेहद प्रिय है।
मूर्ति या तस्वीर स्थापना– इस चौकी पर भगवान श्री कृष्णा और राधा रानी की मूर्ति अथवा तस्वीर की स्थापना करें।
गणेश जी की स्थापना– चावल की देरी पर सुपारी के रूप में भगवान गणेश की स्थापना करें क्योंकि हर शुभ काम की शुरुआत गणेश पूजा से होती है।
कलश स्थापना– चावल से अष्टदल कमल बनाएं और उस पर कलश स्थापना करें। कलश में गंगाजल, शुद्ध जल, एक सुपारी, एक सिक्का, हल्दी, चावल और रोली डालें।
दीपक जलाएँ– कलश पर पांच आम या अशोक के पत्ते रखें, जिन पर चंदन और रोली का टीका करें। इसके ऊपर चावल का एक पात्र रखें, जिसके ऊपर घी का दीपक जलाएं।
इस तरह करें पूजा(Radha Ashtami Puja Vidhi)
भगवान का स्नान: सबसे पहले, राधा कृष्ण की मूर्तियों पर गंगाजल छिड़ककर उनका प्रतीकात्मक स्नान कराएं।
गणेश पूजा– अभी सबसे पहले भगवान गणेश की पूजा करें। उन्हें कलावा, चंदन, रोली, अक्षत और लाल गुलाब चढ़ाएं। गणेश जी को तुलसी के पत्ते नहीं चढ़ाए जाते, अतः उनके लिए अलग भोग रखें।
राधा-कृष्ण पूजा– अब राधा-कृष्ण को कलावा और लाल चुनरी चढ़ाएं। उनके हाथों और पैरों पर चंदन और रोली का तिलक लगाएं, फिर तिलक पर अक्षत लगाएँ।
फूल इत्यादि चढ़ाएं– अब फूल, इत्र और एक बांसुरी चढ़ाएं, जो राधा और कृष्ण दोनों को प्रिय है। राधा रानी को 16 श्रृंगार चढ़ाएं।
न्योछावर– राधा जी को पांच या सात बार पैसों का न्योछावर करें। इन पैसों का उपयोग राधा-कृष्ण की मूर्ति के लिए कुछ खरीदने के लिए करें या दान कर दें।
भोग- राधा अष्टमी के भोग में राधा रानी को प्रिय दही-अरबी की सब्जी चढ़ाई इसके अलावा मिठाई मौसमी फल और जल चढ़ाएं। भोग में तुलसी के पत्ते डालना ना भूले क्योंकि राधा कृष्ण बिना तुलसी के भोग स्वीकार नहीं करते।
व्रत कथा– अपने दाहिने हाथ में फूल या चावल लेकर राधा अष्टमी की कथा सुनें। कथा सुनने के बाद फूल या चावल राधा-कृष्ण के चरणों में चढ़ा दें।
आरती– पहले गणेश जी की आरती करें। फिर राधा-कृष्ण की आरती करें।
लड्डू गोपाल की पूजा– यदि आपके घर में लड्डू गोपाल हैं, तो उन्हें राधा रानी के रूप में पूजें और पंचामृत से स्नान कराएं।
आचमन और क्षमा याचना– पूजा के अंत में आचमन करें और किसी भी भूल के लिए राधा-कृष्ण से क्षमा मांगें।
व्रत के तरीके और नियम
राधा अष्टमी का व्रत तीन तरह से रखा जा सकता है-
- पहली विधि- अष्टमी को सुबह व्रत शुरू करें और दोपहर 12 बजे पूजा के बाद व्रत तोड़ें।
- दूसरी विधि- सप्तमी को व्रत शुरू करें और अष्टमी की सुबह 4 बजे पूजा के बाद व्रत तोड़ें। यह विधि कई मंदिरों में प्रचलित है।
- तीसरी विधि- अष्टमी की सुबह व्रत शुरू करें और नवमी की सुबह व्रत तोड़ें।
व्रत करने का तरीका (फलाहार या निर्जला) व्यक्ति की शारीरिक क्षमता पर निर्भर करता है। यदि आप दोपहर 12 बजे तक व्रत रखते हैं, तो दिन के बाकी समय में शुद्ध सात्विक भोजन ग्रहण कर सकते हैं।
पूजा के बाद की प्रक्रिया
- पूजा के बाद शाम को चौकी हटा सकते हैं।
- राधा जी को चढ़ाया गया सोलह श्रृंगार आशीर्वाद के रूप में स्वयं उपयोग करें।
- फूलों और पत्तों को विसर्जित कर दें। कलश के पानी को घर में छिड़कें या किसी पौधे में डाल दें। कलश से सिक्का और सुपारी अपने पास रखें।
- भोग प्रसाद को परिवार के सदस्यों में बांटें।
राधा अष्टमी पर क्या भोग लगाना चाहिए?
राधा अष्टमी के भोग में राधा रानी को प्रिय दही-अरबी की सब्जी चढ़ाई इसके अलावा मिठाई मौसमी फल और जल चढ़ाएं। इसके अलावा रबड़ी का भोग भी लगाया जा सकता है।